चैत्र नवरात्रि 19 मार्च से शुरू: जानिए कन्या पूजन की परंपरा और 2 से 9 वर्ष की कन्याओं के देवी स्वरूप
चैत्र नवरात्रि 19 मार्च से शुरू होकर 27 मार्च को रामनवमी तक चलेगी। जानिए कन्या पूजन की परंपरा, 2 से 9 वर्ष की कन्याओं को देवी के कौन-कौन से रूप माना जाता है और नवरात्रि में इसका धार्मिक महत्व क्या है।
हिंदू धर्म में चैत्र नवरात्रि को बेहद पवित्र और श्रद्धा का पर्व माना जाता है। इस वर्ष चैत्र नवरात्रि 19 मार्च से शुरू होकर 27 मार्च को Ram Navami के दिन समाप्त होगी। नवरात्रि के नौ दिनों तक भक्त मां दुर्गा की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं और व्रत रखकर उनकी कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इसी महीने देवी का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था, इसलिए यह पर्व भक्तों के लिए बेहद शुभ माना जाता है।
नौ दिनों तक होती है मां दुर्गा के नौ रूपों की आराधना
नवरात्रि के दिनों में मां दुर्गा के नौ रूपों की आराधना की जाती है। इस दौरान श्रद्धालु घरों और मंदिरों में पूजा-पाठ, भजन और अनुष्ठान करते हैं। माना जाता है कि पूरे मन से देवी की आराधना करने से जीवन की परेशानियां दूर होती हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।
कन्या पूजन में बालिकाओं को माना जाता है देवी का स्वरूप
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार नवरात्रि में कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है। इस परंपरा के तहत दो वर्ष से लेकर नौ वर्ष तक की बालिकाओं की पूजा की जाती है। हिंदू मान्यता में इन कन्याओं को देवी के विभिन्न स्वरूपों का प्रतीक माना जाता है। हर उम्र की कन्या एक अलग शक्ति और दिव्य ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करती है।
हर उम्र की कन्या को देवी का अलग रूप माना गया
मान्यता के अनुसार दो वर्ष की बालिका को कुमारी, तीन वर्ष की बालिका को त्रिमूर्ति, चार वर्ष की कन्या को कल्याणी, पांच वर्ष की कन्या को रोहिणी और छह वर्ष की कन्या को कालिका कहा जाता है। इसी तरह सात वर्ष की कन्या को चंडिका, आठ वर्ष की कन्या को शांभवी और नौ वर्ष की कन्या को स्वयं देवी दुर्गा का स्वरूप माना जाता है।
कन्या पूजन में हलवा-पूड़ी का प्रसाद देने की परंपरा
धार्मिक मान्यता है कि नवरात्रि में कन्या पूजन करने से देवी प्रसन्न होती हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। इस अवसर पर कन्याओं को आमंत्रित कर उनका विधि-विधान से पूजन किया जाता है और उन्हें हलवा-पूड़ी का प्रसाद खिलाया जाता है। इसे देवी दुर्गा का प्रसाद माना जाता है और इसे ग्रहण करना बेहद शुभ समझा जाता है।
मार्कंडेय पुराण में मिलता है कन्या पूजन का उल्लेख
मार्कंडेय पुराण में कन्या पूजन का विस्तार से उल्लेख मिलता है। इस ग्रंथ के अनुसार देवी दुर्गा ने बालिका रूप में अवतार लेकर उन असुरों का संहार किया था जो देवताओं और मनुष्यों के लिए खतरा बन चुके थे। यही कारण है कि छोटी कन्याओं की पूजा को देवी दुर्गा की पूजा के समान माना गया है।
ऋषि कात्यायन की तपस्या से प्रकट हुईं देवी कात्यायनी
इसी तरह देवी भगवत पुराण में ऋषि कात्यायन और देवी कात्यायनी की कथा का वर्णन मिलता है। कथा के अनुसार ऋषि कात्यायन ने देवी भगवती की कठोर साधना की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उनके घर पुत्री रूप में जन्म लेने की इच्छा प्रकट की। समय आने पर देवी ने उनके कुल में जन्म लिया और कात्यायनी नाम से प्रसिद्ध हुईं।
कुंवारी कन्या के रूप में हुआ महिषासुर का वध
कथाओं के अनुसार महिषासुर नामक असुर को वरदान मिला था कि उसका वध केवल एक कुंवारी कन्या के हाथों ही संभव होगा। तब देवी ने कात्यायन गोत्र में जन्म लेकर महिषासुर का अंत किया और देवताओं को उसके आतंक से मुक्त कराया। यही कारण है कि कन्या को देवी की शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
ऋषि कात्यायन ने किया देवी का पूजन
जब देवी ने असुरों के विरुद्ध युद्ध किया, तब भी ऋषि कात्यायन ने उन्हें देवी का स्वरूप मानकर पूजा की थी। उन्होंने देवी को मधुपर्क, यानी दही और शहद से बना पेय अर्पित किया, साथ ही गन्ने का रस और सात्विक भोजन देकर उनका सम्मानपूर्वक विदा किया।
मध्यकाल में बढ़ा कन्या पूजन का प्रचलन
इतिहासकारों के अनुसार कन्या पूजन की परंपरा का व्यापक प्रचलन लगभग 14वीं से 16वीं शताब्दी के बीच शुरू हुआ माना जाता है। समय के साथ यह परंपरा हिंदू समाज में गहराई से स्थापित हो गई और आज नवरात्रि का यह अनुष्ठान लगभग हर घर और मंदिर में श्रद्धा के साथ किया जाता है।


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