Shibu Soren Death: झारखंड आंदोलन के प्रतीक, आदिवासी स्वाभिमान की आवाज हमेशा के लिए खामोश

81 वर्ष की उम्र में झारखंड आंदोलन के जनक और तीन बार के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का निधन हो गया। जानिए कैसे उन्होंने झारखंड राज्य का सपना साकार किया और आदिवासियों की आवाज बने।

Shibu Soren Death: झारखंड आंदोलन के प्रतीक, आदिवासी स्वाभिमान की आवाज हमेशा के लिए खामोश
Shibu Soren

झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के संस्थापक और आदिवासी समाज की बुलंद आवाज शिबू सोरेन अब इस दुनिया में नहीं रहे। महज 13 साल की उम्र से उन्होंने आदिवासी अधिकारों की लड़ाई की शुरुआत की थी और झारखंड को अलग राज्य बनाने का सपना देखा — जिसे उन्होंने हकीकत भी बना दिया।

अपनी लंबी राजनीतिक यात्रा में वह तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री और आठ बार लोकसभा सांसद बने।

शिबू सोरेन का जीवन आदिवासियों की पीड़ा को आवाज देने और उनके हक के लिए संघर्ष का प्रतीक रहा। उन्होंने ‘धान काटो आंदोलन’ और महाजन प्रथा के खिलाफ अभियान जैसे कई ऐतिहासिक आंदोलनों की अगुवाई की और 'दिशोम गुरु' के रूप में आदिवासी समाज के पथप्रदर्शक बन गए।

शुरुआत वहीं से हुई, जहां अन्याय ने पिता को छीन लिया
शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को बिहार के रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में हुआ था (अब झारखंड)। जब वह मात्र 13 साल के थे, तब महाजनी प्रथा के खिलाफ आवाज उठाने वाले उनके पिता की हत्या कर दी गई। इस घटना ने शिबू सोरेन की जिंदगी की दिशा तय कर दी। उन्होंने ठान लिया कि अब वो सूदखोरों और महाजनों के खिलाफ आदिवासियों की लड़ाई लड़ेंगे।

‘धान काटो आंदोलन’ से दिशोम गुरु बनने तक का सफर
1970 के दशक में झारखंड में महाजनों का जाल इतना फैल चुका था कि आदिवासी अपनी ही जमीन पर गुलाम बन चुके थे। शिबू सोरेन ने इस जाल को काटने के लिए ‘धान काटो आंदोलन’ शुरू किया, जिसमें महिलाएं खेतों से धान काटती थीं और पुरुष तीर-धनुष लेकर उनकी सुरक्षा करते थे। इस आंदोलन ने उन्हें जननेता बना दिया। धीरे-धीरे लोग उन्हें ‘दिशोम गुरु’ कहने लगे — एक ऐसा मार्गदर्शक, जो पूरे समुदाय के लिए लड़ा। 

"दिशोम" यानी देश या समुदाय और "गुरु" यानी मार्गदर्शक — यह उपाधि उन्हें आदिवासी समाज ने दी।

राजनीतिक पारी: संघर्ष से सत्ता तक
- 1972 में उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की स्थापना की।
- 1977 में पहली बार चुनाव लड़ा लेकिन हार गए।
- 1980 में दुमका लोकसभा सीट से जीत कर संसद पहुंचे।
- इसके बाद उन्होंने नारा दिया — "झारखंड अलग राज्य बनाना है।"
- 15 नवंबर 2000 को उनका सपना साकार हुआ और झारखंड भारत का 28वां राज्य बना।

मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री के रूप में कार्यकाल
- 2005: पहली बार मुख्यमंत्री बने, हालांकि सिर्फ 10 दिनों के लिए।
- 2008 और 2009: दो बार फिर मुख्यमंत्री बने।
- 8 बार लोकसभा सांसद रहे और 3 बार कोयला मंत्री के रूप में केंद्र सरकार में सेवा दी।

शिबू सोरेन की विरासत: आदिवासी चेतना की ज्वाला
उन्होंने सामूहिक खेती, सामूहिक पाठशाला, गांव-आधारित अर्थव्यवस्था जैसे विचारों को बढ़ावा दिया।
उन्होंने नारा दिया — "हमारे हक के बिना कोई विकास नहीं।" वर्तमान में उनके बेटे हेमंत सोरेन झारखंड मुक्ति मोर्चा को आगे बढ़ा रहे हैं।

4 अगस्त 2025: दिशोम गुरु की विदाई
शिबू सोरेन पिछले कई दिनों से दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में भर्ती थे। 19 जून से उनकी हालत गंभीर बनी हुई थी। तमाम कोशिशों के बावजूद 4 अगस्त को उन्होंने 81 वर्ष की उम्र में अंतिम सांस ली।

देश ने खोया एक सच्चा जननेता, झारखंड ने अपना पिता
उनकी जीवन गाथा बताती है कि कैसे एक सामान्य आदिवासी बालक अपने संघर्ष और विचारों के दम पर न सिर्फ नेता बना, बल्कि एक राज्य का निर्माता भी बन गया।