बिहार चुनाव से पहले वोटर लिस्ट पर हंगामा: क्या है SIR और क्यों मचा बवाल?
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले चुनाव आयोग की SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया पर विवाद गहराया। सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, लाखों वोटर्स के मताधिकार पर खतरे की आशंका। पढ़ें पूरी डिटेल।
बिहार में नवंबर 2025 में विधानसभा चुनाव होने हैं। इससे पहले चुनाव आयोग (ECI) ने 1 जुलाई 2025 से मतदाता सूची की Special Intensive Revision प्रक्रिया शुरू कर दी है। चुनाव आयोग का कहना है कि बिहार में पिछली बार मतदाता सूची की गहन समीक्षा 2003 में हुई थी। उसके बाद से यह प्रक्रिया नहीं हुई।
ECI का दावा है कि इससे मतदाता सूची को ज्यादा सटीक और साफ़ बनाया जा सकेगा। आयोग ने कहा कि जिनका नाम 2003 की वोटर लिस्ट में था, उन्हें सिर्फ़ एक Enumeration Form भरना होगा। किसी और दस्तावेज की जरूरत नहीं।
विवाद क्यों?
सारा विवाद उन मतदाताओं को लेकर है जिनका नाम 2003 की वोटर लिस्ट में नहीं था। यानी 2003 के बाद वोटर बने लोग।
2003 के बाद बने वोटर्स से मांगे गए ये दस्तावेज:
- जिनका जन्म 1 जुलाई 1987 से पहले हुआ — जन्मतिथि और जन्मस्थान का सबूत।
- जिनका जन्म 1 जुलाई 1987 से 2 दिसंबर 2004 के बीच — अपनी और माता-पिता में से किसी एक की जन्मतिथि और जन्मस्थान का सबूत।
- जिनका जन्म 2 दिसंबर 2004 के बाद — अपनी और माता-पिता दोनों की जन्मतिथि व जन्मस्थान का सबूत।
विपक्ष और कई नागरिक संगठनों का कहना है कि इतनी सख़्त दस्तावेजी मांग और कम समय-सीमा के चलते लाखों लोग वोट देने के अधिकार से वंचित हो जाएंगे।
क्यों पहुंचा मामला सुप्रीम कोर्ट?
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने चुनाव आयोग के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। याचिका में कहा गया:
- ECI का SIR आदेश मनमाना है।
- इससे लाखों वोटर, ख़ासकर SC, ST, गरीब और प्रवासी मजदूर, मताधिकार से वंचित हो सकते हैं।
- यह जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और निर्वाचक पंजीकरण नियम 1960 का उल्लंघन है।
- संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत सभी नागरिकों को समान मताधिकार का हक़ है।
क्या है सबसे बड़ी चिंता?
- बिहार में गरीबी और पलायन का स्तर काफी ज्यादा है।
- बड़ी आबादी के पास जन्म प्रमाण पत्र या माता-पिता के रिकॉर्ड जैसे दस्तावेज ही नहीं हैं।
- चुनाव आयोग की समयसीमा बहुत कम रखी गई है।
अनुमान है कि करीब 3 करोड़ मतदाता, ख़ासकर हाशिए के समुदायों से आने वाले, वोटिंग से बाहर हो सकते हैं।
चुनाव आयोग का पक्ष
ECI का कहना है कि यह प्रक्रिया बिल्कुल जरूरी है ताकि मतदाता सूची से फ़र्ज़ी नाम हटाए जा सकें। आयोग ने 2003 की वोटर लिस्ट अपनी वेबसाइट पर डाल दी है। जो लोग उस सूची में थे, उन्हें सिर्फ़ फॉर्म भरना है।
SIR यानी Special Intensive Revision की मंशा भले ही मतदाता सूची को सही करना हो, लेकिन इसके लिए रखी गई शर्तें और कड़ी समयसीमा ने बिहार में लाखों वोटर्स के मताधिकार पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब इस पर अंतिम फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट करेगा।


Aankhen 




