जनगणना 2027: परिसीमन और महिला आरक्षण पर राजनीतिक उलझनें, 2029 चुनावों से पहले बदलाव मुश्किल

2027 की जनगणना में 6 साल की देरी। परिसीमन और 33% महिला आरक्षण पर निर्भर राजनीतिक बदलाव 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले संभव नहीं। नई जनगणना के आंकड़े 2034 चुनावों तक लागू होने में आ सकती है बाधा।

जनगणना 2027: परिसीमन और महिला आरक्षण पर राजनीतिक उलझनें, 2029 चुनावों से पहले बदलाव मुश्किल
census 2027 (प्रतीकात्मक तस्वीर)

केंद्र सरकार जल्द ही 16 जून को अगली जनगणना के लिए आधिकारिक अधिसूचना जारी कर सकती है। हालांकि, जनगणना का काम जमीन पर 2026 में शुरू होगा। इस वजह से ‘जनगणना-2027’ की प्रक्रिया में लगभग छह साल की देरी हो गई है। मुख्य वजह कोविड महामारी रही, जिसने जनगणना को टाल दिया और अब इसे पूरा करना आसान नहीं है।

जनगणना का महत्व और देरी के कारण
पिछली जनगणना 2011 में हुई थी, जबकि अगली जनगणना 2021 में होनी थी, पर कोरोना संक्रमण ने इसे रोक दिया। सरकार ने नई जनगणना के लिए 1 अप्रैल 2026 को शुरुआत की तारीख तय की है और 1 मार्च 2027 को ‘रेफरेंस डेट’ माना जाएगा, यानी इस दिन की जनसंख्या को आधार बनाया जाएगा। लेकिन अभी तक यह तय नहीं हो पाया है कि जनगणना के आंकड़े कब तक जारी होंगे।

राजनीतिक अहमियत: परिसीमन और महिला आरक्षण
इस बार की जनगणना के भरोसे राजनीतिक तौर पर दो अहम मुद्दे जुड़े हैं:

निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन:
लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही होता है। देश में अब तक निर्वाचन क्षेत्रों की आबादी में बड़ा अंतर हो गया है, जिससे प्रतिनिधित्व सही नहीं हो रहा। 2026 के बाद की जनगणना को आधार मानकर निर्वाचन क्षेत्रों का नया परिसीमन जरूरी है।

33% महिला आरक्षण:
संसद ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान किया है। लेकिन यह तभी संभव हो पाएगा जब नए परिसीमन के तहत निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं दोबारा तय हों।

समय सीमा और चुनौतियां
सरकारी सूत्रों के अनुसार, 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले जनगणना के आंकड़े उपलब्ध होना और परिसीमन पूरा करना बहुत मुश्किल लग रहा है। पिछली जनगणना के आंकड़े जारी होने में लगभग 2 साल लगे थे। 2001 की जनगणना के बाद परिसीमन आयोग को साढ़े तीन साल लगे थे काम पूरा करने में। इस बार तकनीक बेहतर होने के बावजूद भी कोरोना महामारी के बाद प्रक्रिया सुस्त रह सकती है।

दक्षिण और उत्तर भारत में विवाद
दक्षिणी राज्यों को डर है कि जनसंख्या के आधार पर परिसीमन होगा तो उनकी लोकसभा सीटें कम हो सकती हैं, क्योंकि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में काम किया है। वहीं बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों को सीटों में बढ़ोतरी हो सकती है। इससे राजनीतिक असंतोष बढ़ सकता है। केंद्र में बीजेपी की सरकार है, जो आंध्र प्रदेश में टीडीपी के समर्थन पर निर्भर है। ऐसे में विवादास्पद मुद्दों पर तेजी से काम करना सरकार के लिए चुनौती होगा।