जम्मू-कश्मीर पर फिर छाया बड़ा खतरा: लश्कर–ISKP का खतरनाक गठजोड़, पाकिस्तान की नई साजिश बेनकाब
जम्मू-कश्मीर में बड़े आतंकी हमले की साजिश का खुलासा। लश्कर-ए-तैयबा और ISKP का गठजोड़, ISI की नई रणनीति और पाकिस्तान की दोहरी नीति पर विशेष रिपोर्ट।
जम्मू-कश्मीर में एक बार फिर आतंक की आहट तेज़ हो गई है। खुफिया सूत्रों के अनुसार लश्कर-ए-तैयबा ने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के इशारे पर इस्लामिक स्टेट खोरासान के साथ मिलकर भारत में बड़े आतंकी हमले की योजना तैयार कर ली है। आने वाले दिनों में घाटी को दहलाने के इरादे से आतंकियों का एक नया और खतरनाक नेटवर्क सक्रिय किया गया है।
12 फिदायीन और तीन कमांडर
लश्कर और आईएसकेपी के इस गठजोड़ के तहत जम्मू-कश्मीर में 12 फिदायीन आतंकियों की एक विशेष टुकड़ी बनाई गई है। इस टुकड़ी को तीन हिस्सों में बांटा गया है, जिनकी कमान अबू हुरैरा, मोहम्मद उमर उर्फ खरगोश और मोहम्मद रिज़वान उर्फ अबू दुजाना के हाथों में है। इन तीनों के ऊपर पूरे मॉड्यूल की निगरानी लश्कर के टॉप कमांडर हुजैफा बक्करवाल कर रहा है।
सीमा पार बना नया आतंकी अड्डा
आतंकी गतिविधियों को और संगठित करने के लिए पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा के पास खैबर पख्तूनख्वा के खैबर जिले के पहाड़ी इलाके में एक ज्वाइंट हेडक्वार्टर खड़ा किया गया है। यह हेडक्वार्टर लश्कर-ए-तैयबा और इस्लामिक स्टेट खोरासान दोनों के साझा ऑपरेशन का केंद्र है, जिसे आईएसआई ने पूरी तरह स्थापित कराया है।
हाफिज़ ज़ुबैर की पुरानी और नई भूमिका
इस ज्वाइंट हेडक्वार्टर की कमान हाफिज़ ज़ुबैर मुजाहिद को सौंपी गई है। ज़ुबैर का अतीत बेहद अहम है, क्योंकि वह इस्लामिक स्टेट में जाने से पहले लश्कर-ए-तैयबा और पाकिस्तानी सेना की मिलिट्री इंटेलिजेंस के बीच सेतु की भूमिका निभा चुका है। साल 2019 में लश्कर ने उसे आईएसकेपी में कमांडर बनाकर भेजा, जहां उसने बलूचिस्तान और अफगानिस्तान में कई हमलों को अंजाम दिलवाया।
अफगानी आतंकियों की एंट्री की योजना
अब उसी ज़ुबैर को इस संयुक्त ब्रिगेड का प्रमुख बनाकर अफगानी आतंकियों को जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ कराने की जिम्मेदारी दी गई है। मकसद साफ है—पहले से मौजूद आईएसकेपी-लश्कर मॉड्यूल में अफगान आतंकियों को शामिल कर ताकत बढ़ाना और हमलों को और घातक बनाना।
मॉड्यूल को बड़ा करने की खतरनाक तैयारी
सूत्रों के मुताबिक मौजूदा तीनों कमांडर पाकिस्तानी नागरिक हैं और चार-चार आतंकियों के ग्रुप संभाल रहे हैं। नई रणनीति के तहत अगले छह महीनों में हर ग्रुप को 15 से 20 आतंकियों तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए 45 से 60 अफगान आतंकियों को तैयार किया जा रहा है, जिनकी ट्रेनिंग और तैनाती खैबर पख्तूनख्वा की तिराह घाटी से संचालित होगी।
एक तीर, दो निशाने की नीति
इस योजना का एक और स्याह पहलू यह है कि आईएसआई इस हाइब्रिड मॉड्यूल का इस्तेमाल दोहरे मकसद के लिए करना चाहती है। जहां एक ओर इन आतंकियों को भारत के खिलाफ इस्तेमाल किया जाएगा, वहीं दूसरी ओर इन्हीं से पाकिस्तान के भीतर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के ठिकानों पर हमले कराए जाएंगे, जैसा पहले बलूचिस्तान में बीएलए और बीएलएफ के खिलाफ किया गया।
पुराने नेटवर्क, नई साजिश
घुसपैठ का जिम्मा पुराने और कुख्यात नेटवर्क को सौंपा गया है। रफीक नाई और शमशेर नाई जैसे नाम एक बार फिर सामने आए हैं, जो बीते दो दशकों से जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर के आतंकियों को भारत में दाखिल कराने का काम करते रहे हैं। रावलपिंडी में बैठा हुजैफा बक्करवाल सैटेलाइट फोन के ज़रिए सीधे ऑपरेशन की जानकारी और निर्देश देगा।
आम नागरिकों की मौत और दोहरा खेल
इसी बीच पाकिस्तान की सेना खैबर जिले में एंटी टेरर ऑपरेशन के नाम पर लगातार हवाई हमले कर रही है। पिछले एक साल में इन हमलों में 60 से ज्यादा आम नागरिकों की मौत हो चुकी है, जिनमें बच्चे भी शामिल हैं। पाकिस्तानी सेना एक तरफ आतंकियों को मारने और ठिकाने नष्ट करने के दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर उसी इलाके में आतंकी हेडक्वार्टर खड़ा किया जा रहा है।
दुनिया के सामने पाकिस्तान की असली परीक्षा
इन घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या ऐसे पाकिस्तान पर भरोसा किया जा सकता है जो आतंक के खिलाफ कार्रवाई के दावे करता है, लेकिन परदे के पीछे नए आतंकी गठजोड़ तैयार करता है? और आखिर कब तक भारत को पाकिस्तान की इस प्रॉक्सी वॉर की कीमत चुकानी पड़ेगी?


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