सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: शादी का वादा कर सहमति से बना संबंध बलात्कार नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, विवाह के वादे पर सहमति से बना संबंध बलात्कार नहीं। फॉरेंसिक सबूत की अनुपस्थिति और FIR में देरी को बताया कानून का दुरुपयोग।
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में विवाह के वादे पर सहमति से बनाए गए शारीरिक संबंध को बलात्कार की श्रेणी से बाहर कर दिया है। अदालत ने कहा कि इस मामले में न तो कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य मौजूद है और न ही समय पर प्राथमिकी दर्ज की गई, जिससे यह कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग प्रतीत होता है। तीन साल पुरानी घटना पर बाद में दर्ज केस को अदालत ने निरस्त करते हुए आरोपी युवक के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही समाप्त कर दी।
मामला: कुणाल चटर्जी बनाम पश्चिम बंगाल राज्य एवं अन्य
अपील संख्या: विशेष अनुमति याचिका (आपराधिक) संख्या 7004/2025
पीठ: जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस अरविंद कुमार
एक युवक के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 417, 376, 506 व 34 के साथ-साथ पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत बलात्कार और धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया गया था। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि तीन साल पहले जब वह 15 वर्ष की थी, युवक ने विवाह का झांसा देकर उसके साथ संबंध बनाए और बाद में शादी से इंकार कर दिया।
लेकिन प्राथमिकी उस घटना के तीन साल बाद दर्ज की गई, और FIR दर्ज कराते समय शिकायतकर्ता स्वयं बालिग थी। आरोपी के माता-पिता और चाचा के खिलाफ कार्यवाही पहले ही रद्द हो चुकी थी।
कोर्ट का निष्कर्ष
कोर्ट ने कहा कि विवाह के वादे पर सहमति से बना संबंध बलात्कार नहीं माना जा सकता, यदि इसमें धोखाधड़ी का स्पष्ट और ठोस प्रमाण न हो। प्राथमिकी में अत्यधिक देरी और कोई प्रत्यक्ष या फॉरेंसिक सबूत न होने के चलते मामला कमजोर हो गया। जस्टिस धूलिया और जस्टिस अरविंद कुमार की पीठ ने आरोपी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को पूरी तरह रद्द कर दिया।
किन मामलों का दिया गया हवाला?
- Prithivirajan v. State of Tamil Nadu
- Pramod Suryabhan Pawar v. State of Maharashtra
- Maheshwar Tigga v. State of Jharkhand
इन निर्णयों में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि अगर संबंध आपसी सहमति से बने हैं और उस समय धोखाधड़ी सिद्ध नहीं होती, तो मामला बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता।


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