2026 का अधिकमास: विक्रम संवत 2083 में क्यों होगा 13 माह का अनोखा संयोजन?
2026 में विक्रम संवत 2083 में अधिकमास ज्येष्ठ के रूप में पड़ रहा है, जिससे इस साल 13 महीने होंगे। जानिए पुरुषोत्तम मास के महत्व, तारीखों और धार्मिक मान्यताओं के बारे में विस्तार से।
अंग्रेजी कैलेंडर में जहां नया साल 1 जनवरी से शुरू माना जाता है, वहीं हिंदू परंपरा अपनी समय-गणना सूर्य और चंद्र की चाल के संतुलन पर आधारित विक्रम संवत से करती है। वर्तमान में विक्रम संवत 2082 चल रहा है और आने वाला वर्ष पंचांग की दृष्टि से बेहद खास बनने जा रहा है। वजह है 2026 में पड़ने वाला अधिकमास, जो इस बार ज्येष्ठ मास के रूप में जुड़ रहा है।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होने वाला हिंदू नववर्ष तब एक अनोखे बदलाव से गुजरेगा, क्योंकि 2083 विक्रम संवत में कुल 13 महीने होंगे। पंचांग के मुताबिक सामान्य ज्येष्ठ 22 मई से 29 जून 2026 तक चलेगा, लेकिन इससे पहले 17 मई 2026 से 15 जून 2026 तक अधिक ज्येष्ठ का समय रहेगा। यानी करीब 58–59 दिन तक ज्येष्ठ की अवधि फैली रहेगी।
अधिकमास को ‘पुरुषोत्तम मास’ भी कहा जाता है और इसे हर लगभग 32 माह 16 दिन के बाद कैलेंडर में जोड़ा जाता है। दरअसल, सूर्य वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच लगभग 11 दिन का अंतर हर साल बढ़ता है। इस अंतर को संतुलित करने के लिए अतिरिक्त महीना जोड़कर पंचांग को फिर से व्यवस्थित किया जाता है। इसी प्रक्रिया से अधिकमास अस्तित्व में आता है, जिसे धार्मिक रूप से अत्यंत पवित्र माना गया है।
यह महीना आध्यात्मिक साधना, आत्मचिंतन और मन की शुद्धि का काल माना जाता है, इसलिए विवाह, सगाई, गृहप्रवेश जैसे शुभ कार्य इस अवधि में नहीं किए जाते। यह भी मान्यता है कि इस समय बड़े आर्थिक लेनदेन या संपत्ति खरीदने से बचना चाहिए, क्योंकि अधिकमास का उद्देश्य भौतिक विस्तार नहीं बल्कि आध्यात्मिक उन्नति माना गया है।
अधिकमास में भगवान विष्णु की विशेष पूजा, जप, दान और पाठ को शुभ माना गया है और धार्मिक अनुशासन को सबसे महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। यह महीना भक्तों को अपने मन, कर्म और जीवनशैली का पुनर्मूल्यांकन करने का अवसर देता है।


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