China Victory Day Parade 2025: ताइवान, जापान और अमेरिका को क्या संदेश देना चाहता है ड्रैगन?

चीन ने द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति की 80वीं वर्षगांठ पर अपनी सबसे बड़ी सैन्य परेड आयोजित की। यह आयोजन सिर्फ जापान-विरोधी नहीं बल्कि ताइवान, अमेरिका और पूरे ग्लोबल ऑर्डर को संदेश देने वाला है। जानें, चीन के इस शक्ति प्रदर्शन के असली मायने और भारत की रणनीति।

China Victory Day Parade 2025: ताइवान, जापान और अमेरिका को क्या संदेश देना चाहता है ड्रैगन?
China Victory Day Parade

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति की 80वीं वर्षगांठ पर चीन ने बीजिंग में अपनी सबसे बड़ी सैन्य परेड में से एक का आयोजन किया। चीन ने 1951 में 3 सितंबर को "विक्ट्री डे" घोषित किया था, लेकिन इतनी भव्यता के साथ यह केवल दूसरी बार (पहली बार 2015 में) मनाया गया। सवाल उठता है कि चीन इतना जोर क्यों दे रहा है?

जापान पर सीधा निशाना
चीन इस आयोजन को आधिकारिक रूप से "जापानी आक्रमण पर चीनी विजय" के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। चीनी विश्लेषकों के मुताबिक, यह संदेश जापान के लिए है कि वह ताइवान मुद्दे पर अधिक आक्रामक रुख न अपनाए। बीजिंग चाहता है कि जापान अपनी "Taiwan is our problem" वाली नीति से पीछे हटे और शांतिपूर्ण रुख अपनाए।

ताइवान को दिखाया ‘शक्ति का आईना’
चीनी ऑब्जर्वर्स का मानना है कि यह परेड सीधे ताइवान को चेतावनी देने के लिए भी है। संदेश साफ है कि ताइवान की सैन्य क्षमता चीन के मुकाबले ‘रथ रोकने वाले कीड़े’ जैसी है। बीजिंग का दावा है कि ताइवान के लोगों को उनके नेता गुमराह कर रहे हैं और उन्हें युद्ध में बलि का बकरा बनाया जा रहा है।

साथ ही, चीन विक्ट्री डे को चीन-ताइवान का साझा इतिहास बताकर वहां के लोगों को यह याद दिलाने की कोशिश कर रहा है कि जापानी कब्जे के दौरान चार लाख से ज्यादा ताइवानी नागरिकों की हत्या हुई थी।

अमेरिका और पश्चिम के लिए संकेत
फुडान यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर शेन यी के अनुसार, यह आयोजन सिर्फ जापान और ताइवान को नहीं बल्कि अमेरिका को भी संदेश देता है। चीन की ग्लोबल पावर और रणनीतिक क्षमता का यह बड़ा प्रदर्शन है।

बीजिंग की सोच है कि ताकत दिखाकर वह अमेरिका को संयमित करेगा और उसे चीन की नीतियों के साथ तालमेल बिठाने पर मजबूर करेगा।

पश्चिमी नैरेटिव को चुनौती
चीनी मीडिया और विद्वानों ने इस मौके पर बार-बार यह कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध में फासीवाद को हराने का असली श्रेय चीन और सोवियत संघ को जाता है, न कि अमेरिका और ब्रिटेन को। उनका दावा है कि पश्चिम ने चीन की कुर्बानियों और पैसिफिक युद्ध में उसकी भूमिका को हमेशा कम करके आंका।

रूस और नॉर्थ कोरिया संग नजदीकी
इस परेड के जरिए चीन ने रूस और नॉर्थ कोरिया जैसे देशों के साथ अपने गठबंधन का भी खुलकर प्रदर्शन किया। बीजिंग यह दिखाना चाहता है कि वह ग्लोबल साउथ (Global South) का नेतृत्व करेगा और एक मल्टीपोलर वर्ल्ड ऑर्डर (Multipolar World Order) बनाने में अहम भूमिका निभाएगा।

भारत की रणनीति – संतुलन साधना
भारत ने इस आयोजन को लेकर काफ़ी सोच-समझकर रुख अपनाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने SCO शिखर सम्मेलन में हिस्सा लिया और शी जिनपिंग व पुतिन से मुलाकात की, लेकिन चीन की सैन्य परेड से दूरी बनाए रखी।

चीन पहुंचने से पहले मोदी की जापान यात्रा भी बेहद सफल रही। इससे साफ है कि भारत अपनी Strategic Autonomy (रणनीतिक स्वायत्तता) पर कायम है और दोनों ध्रुवों के बीच संतुलन साध रहा है।