वक्फ कानून पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी, केंद्र ने संशोधन का बचाव करते हुए दिए तर्क

हरियाणा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और असम जैसे छह भाजपा शासित राज्यों ने संशोधन का समर्थन किया। उन्होंने इसे प्रशासनिक सुधार बताते हुए कहा कि इससे संपत्ति विवादों को सुलझाने में मदद मिलेगी।

वक्फ कानून पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी, केंद्र ने संशोधन का बचाव करते हुए दिए तर्क
Supreme Court

सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई हुई। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन धर्मनिरपेक्ष प्रकृति का कार्य है और यह इस्लाम का आवश्यक हिस्सा नहीं है। सॉलिसिटर जनरल ने तर्क दिया, वक्फ बोर्डों में गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करने से धार्मिक गतिविधियों पर कोई असर नहीं पड़ता, क्योंकि बोर्ड का कार्य प्रशासनिक और धर्मनिरपेक्ष है। मेहता ने कहा, यह कानून दुरुपयोग रोकने और वक्फ संपत्तियों के सही प्रबंधन के लिए है।

मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने संशोधन के व्यापक प्रभावों पर गहन विचार किया। गुरुवार को याचिकाकर्ताओं और हस्तक्षेपकर्ताओं की दलीलों पर सुनवाई जारी रहेगी।

याचिकाकर्ताओं की आपत्तियां
कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद और एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने अधिनियम को मुस्लिम समुदाय के अधिकारों का उल्लंघन बताया। उनका आरोप है कि संशोधन अनुच्छेद 26 का उल्लंघन करता है और वक्फ संपत्तियों की धार्मिक स्थिति को खतरे में डालता है। याचिकाकर्ताओं ने कहा, कड़े पंजीकरण नियमों से ऐतिहासिक मस्जिदों, कब्रिस्तानों और धर्मार्थ संस्थानों की पहचान मिटने का खतरा है।

संशोधन के समर्थन में भाजपा शासित राज्य
हरियाणा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और असम जैसे छह भाजपा शासित राज्यों ने संशोधन का समर्थन किया। उन्होंने इसे प्रशासनिक सुधार बताते हुए कहा कि इससे संपत्ति विवादों को सुलझाने में मदद मिलेगी।

संशोधन के प्रावधान और उनका बचाव
केंद्र ने बताया कि संशोधन में वक्फ संपत्तियों की पंजीकरण प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और न्यायसंगत बनाने के लिए बदलाव किए गए हैं। 

- धारा 3-सी: वक्फ संपत्तियों पर विवादों को न्यायाधिकरण में चुनौती देने का प्रावधान।
- पांच साल का इस्लामिक पालन: वक्फ घोषित करने वाले व्यक्ति की धार्मिक मंशा सुनिश्चित करने का उपाय।
- 100 साल पुराने दस्तावेजों की जरूरत नहीं: केवल पिछले पांच वर्षों के रिकॉर्ड मान्य होंगे।