ट्रंप की ‘नोबेल नॉमिनेशन’ से पाकिस्तान में भूचाल: शहबाज शरीफ बने ट्रोल्स के निशाने पर, जानिए क्यों अमेरिका को खुश रखना उनकी मजबूरी है
ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित करने के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ अपने ही देश में ट्रोल हो रहे हैं। जानिए क्यों अमेरिका को खुश रखना पाकिस्तान की मजबूरी है, कैसे पसनी बंदरगाह से लेकर AIM-120 मिसाइल डील तक सब कुछ इस सियासी चाल का हिस्सा है।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तारीफ में पुल बांधना पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को भारी पड़ गया है। मिस्र में आयोजित गाजा शांति सम्मेलन (Gaza Peace Summit) में ट्रंप की मौजूदगी में शहबाज शरीफ ने जिस तरह से अमेरिका और ट्रंप की तारीफ की, उसने पाकिस्तान में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है।
सोशल मीडिया पर पाकिस्तानी यूज़र्स उन्हें “ट्रंप का चाटुकार” और “नोबेल फॉर चापलूसी” का सबसे बड़ा दावेदार बता रहे हैं। ट्विटर (अब X) और फेसबुक पर पाकिस्तानियों ने लिखा — अगर चापलूसी के लिए भी नोबेल अवार्ड होता, तो शहबाज शरीफ को ही मिलता!
ट्रंप की तारीफ और ‘गर्भ घोटाले’ जैसी फजीहत
गाजा शांति सम्मेलन के दौरान ट्रंप ने खुद शहबाज शरीफ को मंच पर बुलाकर कहा था — आप कुछ कहना चाहेंगे? वही कहिए जो पिछली बार कहा था। इसके बाद शहबाज शरीफ ने करीब पांच मिनट तक ट्रंप की शान में कसीदे पढ़े। इस पर पाकिस्तान में लोग भड़क उठे। आलोचकों ने कहा कि प्रधानमंत्री देश की गरिमा के बजाय व्हाइट हाउस की तुष्टि में लगे हैं।
कंगाली में डूबे पाकिस्तान की अमेरिकी ‘मिन्नतें’
असलियत यह है कि पाकिस्तान इस वक्त गहरी आर्थिक तबाही से गुजर रहा है। विदेशी कर्ज, महंगाई और डॉलर की कमी ने उसके हालात बिगाड़ दिए हैं। इसी कारण से शहबाज शरीफ लगातार अमेरिका से आर्थिक सहयोग पाने की कोशिश में हैं।
जानकारी के अनुसार, पाकिस्तान ने बलूचिस्तान के पसनी बंदरगाह (Pasni Port) को अमेरिका को विकसित करने के लिए ऑफर किया है। यह वही इलाका है जो चीन के ग्वादर बंदरगाह से मात्र 110 किलोमीटर दूर है।
इस प्रस्ताव के पीछे असली मकसद यह है कि अमेरिका के निवेश से पाकिस्तान अपने खनिज संसाधनों — खासतौर पर सोने और तांबे — की खुदाई और निर्यात बढ़ा सके।
अमेरिका के साथ खनिज डील: 500 मिलियन डॉलर का सौदा
हाल ही में मिसौरी स्थित यूएस स्ट्रैटेजिक मेटल्स कंपनी ने पाकिस्तानी सेना की निर्माण इकाई फ्रंटियर वर्क्स ऑर्गनाइजेशन (FWO) के साथ 500 मिलियन डॉलर की डील की है। इस समझौते के तहत बलूचिस्तान में खनिज दोहन और बंदरगाह के जरिए निर्यात की योजना है। दरअसल, पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में खनिज को निकालकर तट तक पहुंचाना पाकिस्तान के लिए अकेले मुमकिन नहीं। इसलिए वह अमेरिका की तकनीकी और वित्तीय मदद पर निर्भर है।
बाइडन के समय रिश्ते बिगड़े, ट्रंप के दौर में फिर ‘गुलाबी रिश्ते’
अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्ते हमेशा उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं। जो बाइडन के कार्यकाल में इन संबंधों में ठंडक आ गई थी। उस समय अमेरिका पाकिस्तान की दोहरी नीति — आतंकवाद और तालिबान पर — से नाराज़ था।
अब जब व्हाइट हाउस में फिर डोनाल्ड ट्रंप लौटे हैं, पाकिस्तान को एक बार फिर “पुराने दोस्त” की छांव चाहिए। शहबाज शरीफ और पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने सितंबर 2025 में ट्रंप से व्हाइट हाउस में मुलाकात भी की थी।
भारत के साथ तनाव और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद की चाल
मई 2025 में भारत द्वारा किए गए ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान में सियासी और सैन्य हलचल मच गई थी। ट्रंप ने 10 मई को युद्धविराम कराने का दावा किया था। इसके बाद पाकिस्तानी सेना प्रमुख और शरीफ ने ट्रंप के साथ बैठक कर “शांति वार्ता” का दिखावा किया।
पाकिस्तान को लगता है कि अगर भविष्य में भारत के साथ युद्ध जैसी स्थिति बनती है, तो अमेरिका उसके पक्ष में खड़ा होगा — हथियार देगा, फंड देगा और शायद कूटनीतिक समर्थन भी।
अमेरिकी मिसाइलों की चाह और भारत पर दबाव की रणनीति
हाल ही में अमेरिका ने पाकिस्तान को AIM-120 AMRAAM मिसाइल देने की मंजूरी दी है। यह हाई-टेक एयर-टू-एयर मिसाइल 100 किलोमीटर दूर तक दुश्मन के विमान को गिरा सकती है। इन्हें अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को दिए गए F-16 फाइटर जेट्स पर लगाया जाएगा। पाकिस्तान को उम्मीद है कि इससे भारत पर सैन्य दबाव बनाया जा सकेगा।
याद दिला दें, 2019 में बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान ने इसी तरह की मिसाइल से भारत के MiG-21 विमान को मार गिराया था, और भारतीय पायलट अभिनंदन वर्धमान को कैद कर लिया था।
सेना की पकड़ और ‘हाइब्रिड सरकार’ की सच्चाई
पाकिस्तान की सत्ता इस वक्त पूरी तरह सेना प्रमुख असीम मुनीर के इशारे पर चल रही है। शहबाज शरीफ को सिर्फ “कठपुतली प्रधानमंत्री” कहा जा रहा है। खुद देश के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ इसे “हाइब्रिड रूल” मान चुके हैं — यानी सेना और राजनीति का मिश्रण।
यह सरकार एक साथ चीन, सऊदी अरब और अमेरिका — तीनों को खुश रखने की कोशिश में है।
हाल ही में पाकिस्तान ने चीन से 8.5 अरब डॉलर का निवेश हासिल किया, और अब पसनी बंदरगाह देकर अमेरिका को भी साधने की कोशिश कर रहा है।
‘दो नावों की सवारी’ की नीति: पाकिस्तान की पुरानी बीमारी
पाकिस्तान हमेशा दो नावों में पैर रखकर चलना चाहता है — एक ओर चीन, दूसरी ओर अमेरिका। वह चीन से इंफ्रास्ट्रक्चर और कर्ज चाहता है, तो अमेरिका से मिसाइल और कूटनीतिक सहारा। लेकिन यही दोहरी नीति अब पाकिस्तानी जनता के गले नहीं उतर रही। सोशल मीडिया पर लोग कह रहे हैं — पहले चीन के आगे झुके, अब अमेरिका के पैरों में गिर गए — यही है पाकिस्तान की विदेश नीति!


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