लोकसभा में हंगामे के बीच राहुल गांधी का स्पीकर को पत्र, बोले— मुझे बोलने से रोकना लोकतंत्र पर हमला

बजट सत्र के हंगामे के बीच राहुल गांधी ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखकर बोलने से रोके जाने को लोकतंत्र और संसदीय परंपराओं का उल्लंघन बताया।

लोकसभा में हंगामे के बीच राहुल गांधी का स्पीकर को पत्र, बोले— मुझे बोलने से रोकना लोकतंत्र पर हमला
Rahul Gandhi

संसद के बजट सत्र में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के भाषण को लेकर लगातार दूसरे दिन लोकसभा में भारी हंगामा देखने को मिला। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि स्पीकर की ओर कथित रूप से काग़ज़ उछालने के आरोप में आठ सांसदों को निलंबित कर दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम के कारण राहुल गांधी सदन में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर अपनी बात नहीं रख सके।

हंगामे के बाद राहुल गांधी ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखकर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। उन्होंने पत्र में कहा कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बोलने से उन्हें रोका जाना न केवल संसदीय परंपराओं के खिलाफ है, बल्कि यह लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा प्रहार भी है। कांग्रेस पार्टी ने इस पत्र को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर साझा किया है।

'दस्तावेज़ सत्यापन के बावजूद नहीं मिली बोलने की इजाज़त'
अपने पत्र में राहुल गांधी ने यह भी स्पष्ट किया कि सोमवार को स्पीकर द्वारा जिस मैगजीन को सत्यापित करने को कहा गया था, उसे उन्होंने आज अपने भाषण की शुरुआत में सत्यापित कर दिया था। इसके बावजूद उन्हें आगे बोलने की अनुमति नहीं दी गई, जो स्थापित संसदीय प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है।

संसदीय परंपराओं का हवाला, सरकार की जवाबदेही पर ज़ोर
राहुल गांधी ने पत्र में परंपराओं का हवाला देते हुए लिखा कि सदन में यदि कोई सदस्य किसी दस्तावेज़ का उल्लेख करता है और उसकी जिम्मेदारी लेता है, तो स्पीकर की भूमिका वहीं समाप्त हो जाती है। इसके बाद उस विषय पर जवाब देना सरकार की जिम्मेदारी होती है, न कि विपक्ष की आवाज़ को रोकना।

राष्ट्रीय सुरक्षा पर चर्चा रोकने का आरोप
उन्होंने इस पूरे मामले को राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जोड़ते हुए कहा कि राष्ट्रपति के अभिभाषण में राष्ट्रीय सुरक्षा एक अहम विषय था। ऐसे में विपक्ष के नेता को इस मुद्दे पर बोलने से रोकना यह संकेत देता है कि जानबूझकर संवेदनशील सवालों से बचने की कोशिश की जा रही है।

संसदीय इतिहास में अभूतपूर्व स्थिति का दावा
राहुल गांधी ने पत्र में यह भी कहा कि संसदीय इतिहास में यह पहली बार है जब सरकार के दबाव में स्पीकर को विपक्ष के नेता को बोलने से रोकना पड़ा। उन्होंने इसे लोकतंत्र पर “धब्बा” बताते हुए कहा कि बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकारों से इस तरह का इनकार देश के संसदीय इतिहास में एक खतरनाक मिसाल कायम करता है।