डॉग बाइट पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: अब हर चोट और मौत पर तय होगी जवाबदेही, मुआवजा देना ही होगा
आवारा कुत्तों के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, डॉग बाइट से मौत और चोट पर राज्य सरकारों व डॉग फीडर्स की जवाबदेही तय करने के संकेत।
आवारा कुत्तों से जुड़े मामलों पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि कुत्तों के काटने से होने वाली मौतों और गंभीर चोटों के मामलों में राज्य सरकारों को भारी मुआवजा देना पड़ सकता है। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिए कि अब डॉग बाइट की हर घटना में जिम्मेदारी तय की जाएगी और केवल संवेदनशीलता के नाम पर आंखें मूंदकर नहीं बैठा जा सकता।
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि कुत्ते प्रेमियों और उनका प्रतिनिधित्व करने वाले संगठनों की भी जवाबदेही बनती है। कोर्ट ने दो टूक कहा कि अगर कोई व्यक्ति या समूह आवारा कुत्तों की जिम्मेदारी नहीं ले सकता, तो उन्हें अपने घर या परिसर तक ही सीमित रखें।
एबीसी नियमों पर कानूनी बहस तेज
सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट अरविंद दातार ने अदालत के समक्ष दलील रखते हुए कहा कि 7 नवंबर को दिया गया आदेश पूरी तरह वैधानिक और कानून के अनुरूप है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि इस मामले में किसी नई विशेषज्ञ समिति के गठन की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि एनिमल बर्थ कंट्रोल नियम खुद कई केंद्रीय और राज्य कानूनों के विरोध में हैं।
बच्चों की सुरक्षा पर कोर्ट की चिंता
अरविंद दातार ने वन्यजीव क्षेत्रों में आवारा कुत्तों से उत्पन्न खतरे का मुद्दा उठाते हुए कहा कि यह केवल शहरी समस्या नहीं रह गई है। इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बेहद अहम सवाल पूछा कि अगर किसी 9 साल के बच्चे की मौत कुत्ते के काटने से हो जाती है, तो उसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी?
अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के संकेत
कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि डॉग बाइट से हुई मौत या चोट पर अधिकारियों की जवाबदेही तय होती है और राज्य इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। अदालत ने संकेत दिया कि हर घटना में यह देखा जाएगा कि प्रशासन ने अपनी जिम्मेदारी निभाई या नहीं।
इंसानी जान बनाम भावनात्मक तर्क
सुप्रीम कोर्ट ने डॉग फीडर्स की भूमिका पर भी तीखी टिप्पणी की। अदालत ने पूछा कि क्या भावनाएं सिर्फ कुत्तों के लिए हैं और इंसानों के लिए नहीं? कोर्ट ने कहा कि क्या न्यायालय को आंखें बंद करके इन मौतों और हमलों को नजरअंदाज कर देना चाहिए।
केंद्र और राज्यों से सख्त सवालों की तैयारी
पीठ ने कहा कि आवारा कुत्तों को खुलेआम घूमने और उपद्रव मचाने की अनुमति क्यों दी जानी चाहिए। कोर्ट ने संकेत दिया कि जब केंद्र और राज्य सरकारों की दलीलें सुनी जाएंगी, तब उनसे बेहद गंभीर सवाल पूछे जाएंगे।
भावनात्मक तर्कों पर अदालत की नाराजगी
सुनवाई के दौरान एक वकील ने आवारा कुत्तों को गोद लेने, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए उनकी ट्रैकिंग और अन्य उपायों का सुझाव दिया। इस पर जस्टिस संदीप मेहता ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि काश अनाथ बच्चों के लिए भी इतनी भावुक दलीलें दी जातीं, लेकिन उन्होंने अपने न्यायिक जीवन में इंसानों के लिए ऐसे तर्क कम ही सुने हैं।
पालतू कुत्तों के लिए लाइसेंस की जरूरत
जस्टिस संदीप मेहता ने सवाल किया कि अगर कोई आवारा कुत्ता किसी व्यक्ति पर हमला कर देता है तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा। जब जवाब में स्वयंसेवी संस्थाओं की बात कही गई, तो कोर्ट ने कहा कि कोई भी आवारा कुत्ता किसी के कब्जे में नहीं होना चाहिए और पालतू जानवर रखने के लिए लाइसेंस अनिवार्य है।


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