बिहार में वोटर लिस्ट विवाद: ओवैसी का चुनाव आयोग पर 'गुपचुप एनआरसी' लागू करने का आरोप
बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। असदुद्दीन ओवैसी ने इसे गुपचुप एनआरसी का आरोप लगाया है, जबकि डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा ने इसे पारदर्शी चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बताया।
चुनाव आयोग ने बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की घोषणा की है, जिसे लेकर राजनीतिक हलकों में गर्मागर्मी बढ़ गई है। इस फैसले पर ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने तीखा ऐतराज जताया है।
ओवैसी ने लगाया गुपचुप एनआरसी लागू करने का आरोप
असदुद्दीन ओवैसी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में दावा किया कि चुनाव आयोग गुपचुप तरीके से बिहार में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (NRC)लागू कर रहा है। उनके अनुसार, अब वोटर लिस्ट में नाम दर्ज करवाने के लिए नागरिकों को यह साबित करना होगा कि वे कब और कहां पैदा हुए थे। साथ ही, उन्हें यह भी दस्तावेज़ी प्रमाण देना होगा कि उनके माता-पिता का जन्म कब और कहां हुआ था।
ओवैसी ने इस प्रक्रिया को गरीबों के लिए क्रूर मजाक बताया। उन्होंने कहा कि सीमांचल जैसे बाढ़ प्रभावित इलाकों में लोग दो वक्त की रोटी जुटाने में संघर्ष करते हैं। ऐसे में उनसे अपने माता-पिता के जन्म से जुड़े दस्तावेज़ मांगना असंभव-सा कार्य है। यह प्रक्रिया गरीबों को वोटर लिस्ट से बाहर करने की साजिश है।
डिप्टी सीएम का जवाब: 'पारदर्शी चुनाव की दिशा में कदम'
बिहार के डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा ने चुनाव आयोग के इस कदम का स्वागत किया है। उन्होंने कहा, यह फैसला निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव सुनिश्चित करने के लिए है। जो भी इस पर आपत्ति कर रहे हैं, उन्हें बताना चाहिए कि उन्हें पारदर्शिता से परेशानी क्यों है।
उन्होंने राहुल गांधी और तेजस्वी यादव पर निशाना साधते हुए कहा कि विपक्ष लोकतंत्र के खिलाफ काम कर रहा है। चुनाव आयोग का यह कदम बिहार में निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया को मजबूत करेगा।
क्या है विवाद की जड़?
विशेष गहन पुनरीक्षण के तहत नागरिकों को जन्म और निवास से जुड़े प्रमाण प्रस्तुत करने होंगे। असदुद्दीन ओवैसी के अनुसार, भारत में केवल तीन-चौथाई जन्म पंजीकृत होते हैं और सरकारी दस्तावेजों में अक्सर भारी त्रुटियां पाई जाती हैं। ऐसे में इस प्रक्रिया से गरीब और हाशिए पर खड़े समुदायों के मताधिकार छिनने का खतरा बढ़ सकता है।
इस विवाद से बिहार की राजनीति में नई बहस छिड़ गई है।
1. गरीब और ग्रामीण जनता पर असर: दस्तावेज़ न होने की वजह से बड़ी संख्या में लोग वोटर लिस्ट से बाहर हो सकते हैं।
2. विपक्ष और सत्ताधारी दल की प्रतिक्रिया: जहां विपक्ष इसे गरीब विरोधी बता रहा है, वहीं सरकार इसे पारदर्शिता की दिशा में एक कदम मान रही है।
3. निर्वाचन आयोग की विश्वसनीयता: इस कदम से आयोग की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।


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