49 साल की थकान: वृद्ध ने कोर्ट में कहा - हाँ, चोरी मैंने की थी… अब मुकदमा लड़ने की ताकत नहीं बची
झांसी में 49 साल पुराने चोरी और गबन के मामले में कोर्ट ने फैसला सुनाया, जब आरोपी ने खुद अपना जुर्म कबूल कर लिया। आरोपी ने कहा- अब मुकदमा लड़ने की शक्ति नहीं है। पढ़ें इस इमोशनल केस की पूरी कहानी।
झांसी जिले के टहरौली थाना क्षेत्र के बमनुआ गांव में स्थित एलएसएस सहकारी समिति से जुड़ा एक चोरी और गबन का मामला आजकल फिर सुर्खियों में है—यह मामला 1976 से लंबित था और अदालत को इस पर फैसला करने में 49 वर्षों से अधिक समय लगा। आखिरकार 68 वर्षीय कन्हैया लाल ने अदालत में अपनी स्वैच्छिक स्वीकारोक्ति (confession) करते हुए कहा:
'जज साहब, मैं अब थक गया हूँ। मैं वृद्ध और बीमार हूं, अब मुकदमे लड़ने की ताकत नहीं है। यह जुर्म मैंने किया है, कृपया दया दिखाएं।'
इस बयान के आधार पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मुन्नालाल ने उन पर आईपीसी की धारा 457 (रात में तोड़-फोड़), 380 (चोरी), 409 (सार्वजनिक भरोसे का टूटना), 467, 468 (ठगी/कूट रचना), 120B (साजिश) के तहत दोष तय किया।
कन्हैया लाल को जिस प्रकार न्यायिक हिरासत में बिताई गई अवधि सजा मानी गई और उन्हें ₹2,000 का जुर्माना लगाया गया—₹300 प्रत्येक गैर-साजिश धाराओं पर और ₹500 एक धारा पर।
इस केस में कुल तीन आरोपी थे—लक्ष्मी प्रसाद और रघुनाथ के बीच सुनवाई के दौरान मौत हो गई, जिससे केवल कन्हैया ही बचे। 1976 में तत्कालीन सचिव बिहारीलाल गौतम ने इस चोरी और गबन की शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें रसीद बुक और ₹150 की घड़ी चोरी करने के साथ ₹14,472 की धोखाधड़ी की भी बात कही गई थी। लक्ष्मी प्रसाद ने अकेले ₹3,887 की फर्जी रसीद काटी थी


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